विश्व स्किजोफ्रेनिया दिवस: “मानसिक बीमारी नहीं अभिशाप, समझ और सहयोग से संभव है सामान्य जीवन”

📍आईएमए कानपुर ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने का किया आह्वान, कहा- परिवार का सहयोग सबसे बड़ी थेरेपी
कानपुर। Indian Medical Association की कानपुर शाखा द्वारा “विश्व स्किजोफ्रेनिया दिवस – मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और सामाजिक सहयोग का आह्वान” विषय पर शनिवार को एक महत्वपूर्ण पत्रकार वार्ता का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम आईएमए कॉन्फ्रेंस हॉल, टेम्पल ऑफ सर्विस, 37/7 परेड कानपुर में आयोजित हुआ, जिसमें शहर के वरिष्ठ मनोचिकित्सकों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने समाज में मानसिक रोगों को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने और जागरूकता बढ़ाने की अपील की।
पत्रकार वार्ता को आईएमए कानपुर के अध्यक्ष डॉ. अनुराग मेहरोत्रा, वैज्ञानिक सब कमेटी के चेयरमैन डॉ. ए.सी. अग्रवाल, वरिष्ठ मनोचिकित्सक एवं उपाध्यक्ष डॉ. मनीष निगम, वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. गणेश शंकर, वित्त सचिव डॉ. विशाल सिंह तथा वैज्ञानिक सचिव डॉ. दीपक श्रीवास्तव ने संयुक्त रूप से संबोधित किया।
📍विशेषज्ञों ने बताया कि प्रत्येक वर्ष 24 मई को विश्व स्तर पर “विश्व स्किजोफ्रेनिया जागरूकता दिवस” मनाया जाता है। इसका उद्देश्य समाज में स्किजोफ्रेनिया जैसी गंभीर मानसिक बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना, इससे जुड़ी गलत धारणाओं को समाप्त करना तथा मरीजों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना है।
📌“स्किजोफ्रेनिया कोई पागलपन नहीं, इलाज योग्य मानसिक विकार है”
विशेषज्ञ चिकित्सकों ने कहा कि स्किजोफ्रेनिया एक गंभीर लेकिन पूरी तरह से प्रबंधनीय मानसिक विकार है, जो व्यक्ति की सोचने, महसूस करने, व्यवहार करने और वास्तविकता को समझने की क्षमता को प्रभावित करता है। सही समय पर पहचान और उचित उपचार मिलने पर मरीज सामान्य, सम्मानजनक और उत्पादक जीवन जी सकते हैं।
डॉ. मनीष निगम ने कहा,
“सबसे बड़ी चुनौती बीमारी नहीं, बल्कि समाज की सोच है। लोग मानसिक रोगियों को अलग नजर से देखते हैं, जबकि उन्हें सबसे अधिक जरूरत सहयोग और संवेदनशीलता की होती है।”
उन्होंने कहा कि स्किजोफ्रेनिया को अक्सर लोग ‘स्प्लिट पर्सनैलिटी’ यानी दोहरी व्यक्तित्व वाली बीमारी समझ लेते हैं, जबकि यह पूरी तरह गलत धारणा है।
🛑 इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें
मनोचिकित्सकों ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति में भ्रम होना, अवास्तविक आवाजें सुनाई देना, लोगों से दूरी बनाना, अत्यधिक संदेह करना या असामान्य व्यवहार जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत किसी न्यूरो-साइकिएट्रिस्ट या मनोचिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।
डॉ. गणेश शंकर ने कहा,
“स्किजोफ्रेनिया का उपचार केवल दवाइयों तक सीमित नहीं है। मरीज को परिवार का भावनात्मक सहयोग, सकारात्मक वातावरण और सामाजिक स्वीकार्यता मिलना भी उतना ही जरूरी है।”
📍“परिवार का साथ ही सबसे बड़ी थेरेपी”
विशेषज्ञों ने कहा कि मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए परिवार का व्यवहार उपचार प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है। दवाइयों, मनोचिकित्सा, काउंसलिंग और पुनर्वास सेवाओं के माध्यम से मरीजों को सामान्य जीवन की ओर वापस लाया जा सकता है।
डॉ. अनुराग मेहरोत्रा ने कहा,
“मानसिक स्वास्थ्य भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है। समाज को यह समझना होगा कि मानसिक बीमारियां कोई कमजोरी नहीं, बल्कि चिकित्सा से ठीक होने वाली स्थितियां हैं।”
📍सरकार की योजनाओं से बढ़ रही पहुंच
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) और Ayushman Bharat जैसी योजनाओं के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे मरीजों को बेहतर उपचार और परामर्श उपलब्ध हो सके।
🛑 समाज से संवेदनशीलता की अपील
आईएमए कानपुर ने आमजन से अपील की कि मानसिक रोगों को कलंक की दृष्टि से न देखें और जरूरतमंद व्यक्तियों को उपचार के लिए प्रेरित करें। विशेषज्ञों ने कहा कि जागरूकता, समय पर उपचार और सामाजिक सहयोग ही स्किजोफ्रेनिया जैसी बीमारी से लड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
कार्यक्रम के अंत में चिकित्सकों ने संयुक्त संदेश दिया—
“समझ, सहयोग और समय पर उपचार — स्किजोफ्रेनिया से लड़ाई का सबसे बड़ा आधार है।”


