हाईकोर्ट की सख्ती बरकरार, अधिकारियों को अंतिम अवसर
हाईकोर्ट की सख्ती बरकरार, अधिकारियों को अंतिम अवसर; आदेश का पालन न होने पर फिर होगी अवमानना की कार्रवाई
कानपुर। गोविंद नगर के ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क में कथित अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। माननीय न्यायमूर्ति विकास बुधवार की एकलपीठ ने अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान प्रथम दृष्टया माना कि 22 अप्रैल 2026 के आदेश की अवहेलना का मामला बनता है। हालांकि न्यायालय ने फिलहाल अवमानना नोटिस जारी करने के बजाय संबंधित अधिकारियों को एक माह का अंतिम अवसर देते हुए पूर्व आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि नगर निगम एवं कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) के अभिलेखों में पार्क एवं खेल मैदान के रूप में दर्ज भूमि का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने जिला मजिस्ट्रेट, नगर आयुक्त तथा केडीए उपाध्यक्ष को निर्देश दिया था कि पार्क को अतिक्रमण मुक्त कर उसका मूल स्वरूप बहाल किया जाए तथा भविष्य में उसका उपयोग केवल पार्क एवं खेल मैदान के रूप में ही सुनिश्चित किया जाए।
तीन माह बाद भी नहीं हुआ पालन
अवमानना याचिका में कहा गया है कि 29 अप्रैल 2026 को न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध करा दी गई थी, लेकिन तीन माह से अधिक समय बीतने के बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया। आरोप है कि पार्क का मूल स्वरूप बहाल करने के बजाय विवादित निर्माणों को यथावत बनाए रखा गया।
70 प्रतिशत पार्क पर इंटरलॉकिंग का आरोप
याचिका के अनुसार नगर निगम ने कथित विकास कार्यों के नाम पर पार्क में पहले से मौजूद अवैध निर्माणों को हटाने के बजाय लगभग 70 प्रतिशत हिस्से में इंटरलॉकिंग बिछा दी। इससे पार्क का हरित क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित हुआ और वर्षों पुराना सार्वजनिक पार्क कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया।
- पार्क के अधिकांश हिस्से में इंटरलॉकिंग बिछाई गई।
- अवैध निर्माणों को हटाने के बजाय संरक्षण दिया गया।
- पार्क का मूल स्वरूप बदलकर हरित क्षेत्र कम कर दिया गया।
- हाईकोर्ट के आदेश की भावना के विपरीत कार्य किए गए।
‘ब्लॉक-8 पार्क’ से ‘बालाजी पार्क’ बनाने का आरोप
याची प्रकाश वीर आर्य ने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद नगर निगम ने रातोंरात पार्क में लगे पुराने शिलापट्ट, जिस पर “ब्लॉक-8 पार्क” अंकित था, को हटाकर उसकी जगह “बालाजी पार्क” नाम का नया शिलापट्ट लगा दिया। उनका कहना है कि यह परिवर्तन वास्तविक स्थिति को प्रभावित करने और न्यायालय की आंखों में धूल झोंकने के उद्देश्य से किया गया।
उन्होंने बताया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत नगर निगम के उद्यान अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराई गई आधिकारिक सूचना में भी संबंधित स्थल का नाम “ब्लॉक-8 पार्क” ही दर्ज है। ऐसे में अभिलेखों के विपरीत नया शिलापट्ट लगाए जाने से नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
एडवोकेट जे.पी. दुबे ने उठाए गंभीर सवाल
— जे.पी. दुबे, एडवोकेट
केस्को की भूमिका भी जांच के घेरे में
प्रकरण में केस्को की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। जांच आख्या के अनुसार विवादित परिसर को क्षेत्रीय पार्षद द्वारा दिए गए एनओसी एवं अन्य दस्तावेजों के आधार पर नया विद्युत संयोजन प्रदान किया गया। सवाल यह उठ रहा है कि किसी सार्वजनिक पार्क की भूमि पर बने निर्माण के लिए क्षेत्रीय पार्षद को एनओसी जारी करने का अधिकार किस नियम अथवा शासनादेश के तहत प्राप्त है।
क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि सार्वजनिक पार्क के रूप में दर्ज भूमि तथा हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद सक्षम प्राधिकारी से सत्यापन किए बिना विद्युत संयोजन देना नियमों के विपरीत प्रतीत होता है।
अब सबकी निगाहें एक माह की समय सीमा पर
अब पूरे शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायालय द्वारा दिए गए एक माह के अंतिम अवसर के भीतर संबंधित अधिकारी आदेश का पालन करते हैं या नहीं। यदि निर्धारित अवधि में अनुपालन नहीं हुआ तो मामला पुनः हाईकोर्ट पहुंचेगा और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना की कार्रवाई आगे बढ़ सकती है।

