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बैंकिंग शुल्कों का बढ़ता बोझ बना बड़ा मुद्दा

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कानपुर। महंगाई और रोजमर्रा के खर्चों से जूझ रही आम जनता के सामने अब बैंकिंग सेवाओं पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क एक नई परेशानी बनकर उभर रहे हैं। लोगों का कहना है कि दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना जहां पहले ही मुश्किल होता जा रहा है, वहीं बैंकों द्वारा वसूले जा रहे विभिन्न शुल्क उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर रहे हैं।आम उपभोक्ताओं का आरोप है कि बैंकों द्वारा लिए जाने वाले कई “हिडन चार्जेज” उनकी मेहनत की कमाई को धीरे-धीरे खत्म कर रहे हैं। सेविंग अकाउंट में न्यूनतम बैलेंस न बनाए रखने पर जुर्माना, एटीएम से निर्धारित सीमा से अधिक निकासी पर शुल्क, लंबे समय तक निष्क्रिय खातों से कटौती, और यहां तक कि बैंक स्टेटमेंट प्राप्त करने पर भी फीस वसूली जा रही है। इन सभी शुल्कों का सीधा असर मध्यम और निम्न वर्ग की जेब पर पड़ रहा है।स्थिति की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि कई ग्राहकों को इन शुल्कों की पूरी जानकारी तक नहीं होती। बिना स्पष्ट जानकारी के खाते से कटने वाली राशि लोगों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। उपभोक्ताओं का कहना है कि पारदर्शिता की कमी के कारण उन्हें बार-बार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।वहीं अब इन बैंकिंग शुल्कों को समाप्त करने या कम करने की मांग जोर पकड़ने लगी है। लोगों का कहना है कि जब बैंकिंग सेवाएं आम जनता की सुविधा के लिए हैं, तो इस प्रकार के अतिरिक्त शुल्क गरीब और मध्यम वर्ग के साथ अन्याय के समान हैं। एनईएफटी और अन्य डिजिटल लेनदेन पर लगने वाले शुल्कों को भी खत्म करने की मांग की जा रही है, ताकि लोगों को राहत मिल सके और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिले।स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। आम जनता को राहत देने के लिए बैंकिंग शुल्कों की समीक्षा कर उन्हें युक्तिसंगत बनाया जाना आवश्यक है।अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर बार आर्थिक बोझ आम जनता पर ही क्यों डाला जाता है, जबकि सबसे ज्यादा संरक्षण की आवश्यकता भी उसी वर्ग को होती है। यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो यह मुद्दा आने वाले समय में और बड़ा जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।

*बिंदास बोल कानपुर से राजू गौड़ की रिपोर्ट*

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