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न्याय मांगना पड़ा भारी!” CSJMU के दलित छात्र को ‘हाफ एनकाउंटर’ की धमकी’

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📍पुलिस पर गंभीर आरोप एफआईआर के बाद भी नहीं थमी प्रताड़ना;

📢 छात्र बोला—“अब जान बचाना भी चुनौती बन गया है”

कानपुर।छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय के दलित छात्र सचिन चंद्रा का मामला अब केवल एक आपराधिक विवाद नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल बनकर उभरा है। न्यायालय के आदेश पर एफआईआर दर्ज होने के बावजूद छात्र को लगातार धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। आरोप है कि केस वापस न लेने पर उसे ‘हाफ एनकाउंटर’ जैसी भयावह चेतावनी दी जा रही है।

👉 पीड़ित के अनुसार, 26 अक्टूबर 2024 को उनके साथ जातिसूचक अपमान, मारपीट और जानलेवा हमला किया गया। आरोप है कि घटना में शामिल लोगों में कुछ पुलिसकर्मी और प्रभावशाली व्यक्ति भी थे, जिन्होंने न केवल हमला किया बल्कि उनके मुंह में पिस्टल डालकर जान लेने की कोशिश की। यह घटना केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि सामाजिक उत्पीड़न की एक भयावह तस्वीर भी पेश करती है।घटना के बाद उम्मीद थी कि कानून मदद करेगा, लेकिन पीड़ित का आरोप है कि पुलिस ने उल्टा उनका ही साथ नहीं दिया। मेडिकल रिपोर्ट जब्त कर ली गई और एफआईआर दर्ज करने से बचने की कोशिश की गई। जब छात्र ने उच्च अधिकारियों से शिकायत की, तब भी कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा 24 दिसंबर 2024 को उनके खिलाफ ही एक कथित झूठा मुकदमा दर्ज कर दिया गया।

📍—जिसे छात्र दबाव और प्रतिशोध की कार्रवाई बता रहे हैं।न्याय की राह आसान नहीं थी, लेकिन सचिन चंद्रा ने हार नहीं मानी। उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और 18 फरवरी 2025 को याचिका दायर की। अदालत के सख्त रुख के बाद 17 जुलाई 2025 को आखिरकार आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।लेकिन इसके बाद शुरू हुआ असली डर का दौर।पीड़ित का कहना है कि जनवरी 2026 से उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं।

📍 8 अप्रैल 2026 को दलहन क्रॉसिंग, कल्याणपुर के पास हुई ताजा घटना ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। बाइक सवार दो युवकों ने उन्हें रोककर धमकी दी—>

“चार्जशीट हमारे हिसाब से ही लगेगी, ज्यादा कोर्ट गए तो हाफ एनकाउंटर कर देंगे।”

📍यह धमकी सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसा डर है जो पीड़ित और उसके परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है।जब सचिन चंद्रा इस घटना की शिकायत लेकर स्थानीय पुलिस चौकी पहुंचे, तो वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। आरोप है कि रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय पुलिस ने उलटे उनसे ही सवाल-जवाब कर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।मामला क्यों है गंभीर?यह पूरा प्रकरण कई बड़े सवाल खड़े करता है

📍—क्या पीड़ित को न्याय मांगने की सजा मिल रही है?क्या प्रभावशाली लोगों के दबाव में जांच प्रभावित हो रही है?क्या कानून का डर अब पीड़ित को ही सता रहा है?

🛑पीड़ित की प्रमुख मांगें

सचिन चंद्रा ने शासन-प्रशासन और मुख्यमंत्री से अपील की है कि—

📍उन्हें और उनके परिवार को तत्काल सुरक्षा दी जाएमामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या SIT से कराई जाएधमकी देने वालों और लापरवाह पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई होझूठे मुकदमों की भी निष्पक्ष जांच कर न्याय दिलाया जाए>

📍“अगर न्यायालय के आदेश के बाद भी एक छात्र खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा,

📍 तो यह केवल एक केस नहीं—पूरे सिस्टम की नाकामी का संकेत है।”>

📌 “जब पीड़ित ही डर के साए में जीने लगे और आरोपी बेखौफ घूमें, तो यह कानून के राज पर सीधा सवाल है।”>

“यह मामला सिर्फ सचिन चंद्रा का नहीं, बल्कि उन सभी लोगों का है जो न्याय के लिए आवाज उठाने की हिम्मत करते हैं।

🛑”निष्कर्ष

यह घटना कानून-व्यवस्था, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही की एक कठिन परीक्षा बन चुकी है। अब निगाहें शासन और प्रशासन पर टिकी हैं।

🛑—क्या पीड़ित को सुरक्षा और न्याय मिलेगा, या फिर यह मामला भी दबाव और डर के साये में दबकर रह जाएगा?

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