आबादी के अनुपात में मुसलमानों का भागीदारी आन्दोलन:- शाकिर अली उस्मानी
कानपुर। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सरकारों का गठन होता है। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैय्यार हो गया जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। संविधान निर्माता डा० भीमराव अम्बेडकर ने 20.5 प्रतिशत आरक्षण अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए लोकसभा, विधानसभा के साथ 2 सरकारी नौकरियों में आरक्षित कर दी जो आज तक जारी है। काका कालेकर और मंडल कमीशन की रिपोर्ट 1989 में देश के प्रधानमंत्री मा० विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लागू कर दिया। पिछड़ी जाति को 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया और 2 प्रतिशत दलितों के आरक्षण में बढ़ोत्तरी कर 22.5 प्रतिशत कर दिया देश में सामान्य जाति का सरकारी नौकरियां 50.5 प्रतिशत की भागीदारी आज भी सुनिश्चित है। दलितों, पिछड़ों व अगडे समाज की देश में भागीदारी मिल रही है। परन्तु अल्पसंख्यक समाज का सबसे बड़ी आबादी मुस्लिम समाज की है। उ0प्र0 में 1989 से 2017 तक बहन मायावती, मा० मुलायम सिंह यादव एवं 5 साल तक मा० अखिलेश यादव की सरकार थी और मुस्लिम समाज को भागेदारी नहीं दिया । बहन मायावती एवं माननीय अखिलेश यादव जी की 5-5 साल की सरकार में अगड़ी जातियों को खुश करने में गंवा दिया।1984 में बहुजन नायक एवं बी०एस०पी० के संस्थापक अध्यक्ष मान्यवर कांशीराम ने नारा दिया जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी भागीदारी। लोगों नें विश्वास करके बहुजन समाज पार्टी से जुड़े और बहन मायावती को 4 बार उ०प्र० की मुख्यमंत्री बनाया। वर्ष 2004 से 2014 तक केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। परन्तु दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यक समाज को जोड़ने में असफल रही । कांग्रेस, सपा, बसपा ने जिन नेताओं पर विश्वास करके मंत्री व लाभकारी स्थानों पर आसीन किया। वे अधिकांश आज भा०ज०पा० में शामिल होकर उनकी ताकत को बढ़ा रहे। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकांश नेता भा०ज०पा० में शामिल होकर अपना एवं अपने काले धन की सुरक्षा कर रहे हैं। केन्द्र में भा०ज०पा० की सरकार है परन्तु एक भी मुस्लिम समाज का व्यक्ति मंत्री नहीं बनाया गया है। क्या यही भा०ज०पा० को सबका विश्वास सबका विकास वाली सरकार है।हम सब मिलकर चिंतन करें कि देश में एवं उ०प्र० के मुसलमानों को दुर्दशा का कौन जिम्मेदार है? कांग्रेस, सपा, बसपा, टी०एम०सी० जनता दल ने अपने शासन काल में मुसलमानों को शासन, प्रशासन में आबादी के अनुपात में भागीदारी दी होती तो आज मुसलमानों की यह दुर्दशा न होती ।मुसलमानों के राजनैतिक भागीदारी के सवाल व जन आन्दोलन, जन चेतना की आवश्यकता है जिसमें मैं आपके आर्थिक सहयोग व हिस्सेदारी की आवश्यकता है। बगैर भागीदारी के कोई समाज विकास नहीं कर सकता है ।

